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मेरी मां की अधूरे ख्वाहिशबचपन में था उनको पढ़ने का शौक- श्रीमती संतोष ताम्रकार की कलम से

मेरी मां की अधूरे ख्वाहिश
बचपन में था उनको पढ़ने का शौक
सखी सहेलियां के साथ खेलने का शौक
अपने बचपन को जी भर जी लेने का शौक
मां पापा के आंगन में खेलने का शौक
गांव की गलियारी में सखी सहेलियां के साथ मस्ती कर घूमने का शौक
रह गए अधूरी मां के सपने
कम उम्र में ब्याह का होना
बाबुल के आंगन में अधूरे सपने
अपनी हंसी दबाकर
अपनी चुलबुले पन को पीछे छोड़कर चली आई
ससुराल के आंगन रह गए अधूरे सपने
कभी देखे थे मां ने सपने बच्चे पढ़ लिख कर होंगे अधिकारी
वह भी सपने रह गए अधूरे
शहरों में रैन बसेरा हो
हस्ता खेलता छोटा सा परिवार हो
गांव की चार दीवारों में हो गई वह भी बंद अधूरे सपने
क्या मां की किस्मत में अधूरे सपने ही लिखे होते हैं
वह अपने सपने पूरे करने के लिए दूसरों पर आश्रित रहती है
शायद यही वजह है मां के अधूरे सपने की
परिवार के साथ पिकनिक मना
हंसी सुनहरा प्यार भरा पल बिताना
सभी की खुशियों का ध्यान रखना
बस यही तो चाहती है मां
मां कभी अपने स्वार्थ में कुछ नहीं सोचती
अपने स्वार्थ में सभी की खुशियां ढूंढती फिरती
एक मां के अधूरे सपने

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