
आत्मनिर्भर दलहन मिशन से मिले प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन से घनश्याम धुर्वे ने अपनाई उन्नत कृषि पद्धतियां
राज नेशनल न्यूज़ खैरागढ़ // सेवा संकल्प अभियान-2026 के तहत ग्राम ठाकुरटोला निवासी किसान घनश्याम धुर्वे ने आत्मनिर्भर दलहन मिशन से मिले प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन को अपनी खेती में अपनाकर ग्रीष्मकालीन मूंग के उत्पादन में बेहतर परिणाम हासिल किए हैं। उन्नत बीज, कतार बोनी, स्प्रिंकलर सिंचाई और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों के उपयोग से उन्होंने कम लागत में बेहतर उत्पादन की दिशा में कदम बढ़ाया है। गुणवत्तापूर्ण मूंग बीज तैयार होने से आसपास के किसानों में भी इसकी मांग बढ़ी है।
घनश्याम धुर्वे के पास 1.676 हेक्टेयर कृषि भूमि है। उन्होंने मिशन के अंतर्गत ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती की और कृषि विभाग की सलाह के अनुसार कतार बोनी विधि अपनाई। इससे उन्हें लगभग 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त हुआ। फसल के बेहतर परिणाम से उन्हें दलहन उत्पादन में उन्नत तकनीकों के उपयोग के लिए प्रोत्साहन मिला।
जल संरक्षण के साथ प्राकृतिक पद्धति पर जोर
मूंग की फसल में उन्होंने स्प्रिंकलर सिंचाई का उपयोग किया, जिससे पानी का बेहतर उपयोग करने में मदद मिली। साथ ही रासायनिक दवाइयों के स्थान पर जैविक कीटरोधक उपायों को अपनाने का प्रयास किया। फसल की हाथ से तुड़ाई के बाद बचे अवशेषों को आगामी खरीफ सीजन में धान की फसल के लिए हरित खाद के रूप में मिट्टी में मिलाने की पहल की।
गुणवत्तापूर्ण बीज की बढ़ी मांग
फसल की फलियों की हाथ से तुड़ाई और बीज चयन में सावधानी बरतने से तैयार मूंग बीज की गुणवत्ता बेहतर रही। आसपास के किसानों ने अपने उपयोग के लिए घनश्याम से बीज की मांग की। इससे उन्हें अपनी उपज का बेहतर मूल्य प्राप्त करने के साथ बीज उत्पादन को आगे बढ़ाने का अवसर मिला।
प्रशिक्षण से 50 किसान हुए लाभान्वित
आत्मनिर्भर दलहन मिशन के अंतर्गत आयोजित प्रशिक्षण एवं तकनीकी मार्गदर्शन कार्यक्रमों में घनश्याम धुर्वे सहित अन्य किसानों ने भाग लिया। फसल आधारित समूह में आयोजित गतिविधियों से लगभग 50 किसान लाभान्वित हुए। प्रशिक्षण में मिली जानकारी को खेतों में अपनाने से किसानों को दलहन की उन्नत खेती और जल संरक्षण की तकनीकों की जानकारी मिली।
घनश्याम धुर्वे ने खेती में तकनीकी जानकारी को व्यवहार में उतारते हुए उत्पादन के साथ गुणवत्तापूर्ण बीज तैयार करने की दिशा में भी पहल की है। उनकी खेती में अपनाई गई पद्धतियां आसपास के किसानों को दलहन उत्पादन की नई तकनीकों से परिचित कराने में उपयोगी साबित हो रही हैं।



