राज नेशनल न्यूज़ दुर्ग : आज की आधुनिक और भागदौड़ भरी जिंदगी में हर व्यक्ति खुशियों की तलाश में न जाने कहां-कहां भटक रहा है। व्यस्तता इतनी बढ़ गई है कि जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगांठ, प्रमोशन या अन्य खुशियां अक्सर पार्टी और कुछ खास लोगों तक ही सीमित रह जाती हैं। इन खुशियों का एहसास कुछ पलों तक रहता है, लेकिन यदि हमारी खुशी किसी दूसरे के चेहरे पर मुस्कान बन जाए, तो उसका प्रभाव कहीं अधिक गहरा और स्थायी होता है।
मेरा मानना है कि खुशियां केवल अपने लिए मनाने का नाम नहीं है। यदि हम किसी दूसरे के चेहरे पर थोड़ी देर के लिए ही सही, मुस्कान लाने की वजह बन जाएं तो हमारा जीवन भी सार्थक महसूस होता है। जब मैं किसी जरूरतमंद की मदद करती हूं या किसी बच्चे के जन्मदिन पर बहुत कुछ न कर पाने की स्थिति में केवल दस रुपये की चॉकलेट ही दे पाती हूं और उसके चेहरे पर जो खुशी दिखाई देती है, वही मेरे लिए अनमोल होती है।
इसी सोच के साथ हम अपने परिवार की खुशियां भी जरूरतमंदों के साथ साझा करने का प्रयास करते हैं। अपने दोनों बच्चों के जन्मदिन पर अक्सर वृद्धाश्रम, अनाथालय अथवा बेसहारा लोगों के बीच जाकर यथासंभव सहयोग करते हैं। उनके चेहरे पर आने वाली मुस्कान ही हमारे लिए सबसे बड़ी खुशी होती है।
मेरे पापा भी अपने जन्मदिन पर इसी तरह जरूरतमंद लोगों के बीच जाकर अपनी खुशियां साझा करते हैं। वहीं मेरे ससुर जी और सासू मां की पुण्यतिथि पर मंदिरों में दान करने के बजाय हम ऐसे स्थानों पर जाकर उनके नाम से जरूरत का सामान उपलब्ध कराने और जरूरतमंदों के साथ कुछ समय बिताने का प्रयास करते हैं। ऐसा लगता है कि उनकी स्मृति में किया गया यह छोटा-सा प्रयास किसी के जीवन में थोड़ी राहत और खुशी ला सके।
ऐसे अवसरों पर वहां निस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले लोगों को देखकर मन में कई सवाल उठते हैं। आखिर हम भी ऐसा क्यों नहीं कर पाते? यदि हमारे परिवार या समाज में कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसे हमारी जरूरत है, तो हम उसकी मदद क्यों न करें? ये विचार बार-बार मन में आते हैं।
कई बार वहां मौजूद विशेष जरूरत वाले लोगों को देखकर मन भावुक हो जाता है। लगता है कि काश, मैं इनके लिए और कुछ कर पाती। उनकी परिस्थितियां उन्हें हमसे कहीं अधिक विशेष बनाती हैं, लेकिन शायद इसी वजह से समाज के कई लोग उनसे दूरी बना लेते हैं। यदि कभी मुझे ऐसे लोगों की सेवा करने का अवसर मिला, तो मैं पूरे मन से उनके लिए कुछ करना चाहूंगी।
शायद यही आंतरिक खुशी है—जब अपनी खुशी से ज्यादा किसी दूसरे की आंखों में खुशी देखकर मन प्रसन्न हो। कुछ समय के लिए किसी के साथ बैठना, उसकी जरूरत की छोटी-सी वस्तु देना, उसके चेहरे पर मुस्कान लाना और उसके साथ अपनत्व के कुछ पल बिताना भले ही हमारे लिए छोटा प्रयास हो, लेकिन किसी जरूरतमंद के लिए वह बहुत बड़ी बात हो सकती है।
मेरी खुशियों की सबसे बड़ी वजह अब यही है कि मैं किसी के चेहरे पर खुशी देखने की वजह बन सकूं। क्योंकि खुशियां बांटने से कम नहीं होतीं, बल्कि और बढ़ जाती हैं।



