अष्टभुजा देवी के आदर्शों को जीवन में उतारने का दिया संदेश, स्वाध्याय, अनुशासन और निस्वार्थ नेतृत्व से रचा इतिहास
राज नेशनल न्यूज़ दुर्ग : भारत की महान समाजसेविका, राष्ट्रभक्त एवं राष्ट्रीय सेविका समिति की संस्थापिका वंदनीय लक्ष्मीबाई केलकर (मौसीजी) का जीवन आज भी सेवा, समर्पण, संस्कार और राष्ट्रभक्ति का अनुपम उदाहरण माना जाता है। वर्ष 1936 में उन्होंने महिलाओं को संगठित, सशक्त और राष्ट्र निर्माण के लिए जागरूक बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय सेविका समिति की स्थापना की। उनका दृढ़ विश्वास था कि शिक्षित, आत्मनिर्भर और संस्कारित नारी ही परिवार, समाज और राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला बन सकती है।
मौसीजी ने अष्टभुजा देवी को समिति की प्रेरणा-शक्ति के रूप में स्थापित किया। देवी के आठ भुजाओं को उन्होंने साहस, शक्ति, ज्ञान, सेवा, त्याग, करुणा, संयम और कर्तव्यनिष्ठा जैसे जीवन मूल्यों का प्रतीक बताया। वे प्रत्येक सेविका को इन गुणों को अपने जीवन में धारण कर समाज और राष्ट्र के उत्थान में योगदान देने की प्रेरणा देती थीं।
स्वाध्याय उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक था। बचपन से ही वे वेद-शास्त्र, धार्मिक ग्रंथों तथा सत्साहित्य का अध्ययन करती थीं। लोकमान्य तिलक की पत्रिका ‘केसरी’ ने उनके भीतर राष्ट्रभक्ति और स्वदेशी की भावना को और प्रबल बनाया। उनकी अद्भुत स्मरण शक्ति और अध्ययनशीलता ने उन्हें एक प्रभावशाली नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित किया।
उनकी विनम्रता और निस्वार्थ नेतृत्व का उदाहरण वर्ष 1949 की अखिल भारतीय बैठक में देखने को मिला, जब उनके स्थान पर किसी अन्य को प्रमुख बनाने का प्रस्ताव आया। उन्होंने बिना किसी विरोध के कहा कि यदि संगठन को किसी और के नेतृत्व की आवश्यकता है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं, क्योंकि संगठन व्यक्ति से बड़ा होता है। उनके इस त्यागपूर्ण भाव से प्रभावित होकर सभी सेविकाओं ने सर्वसम्मति से उन्हें ही पुनः प्रमुख बनाए रखने का निर्णय लिया।
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर ने भी उनके कार्य की सराहना करते हुए कहा था कि “राष्ट्रीय सेविका समिति का कार्य रिमझिम वर्षा की तरह है, जो धरती की नमी बनाए रखता है। इसलिए इस कार्य की आवश्यकता सदैव रहेगी।” यह कथन मौसीजी के सामाजिक योगदान की महत्ता को दर्शाता है।
मौसीजी का जीवन अहंकार से कोसों दूर था। वे मानती थीं कि सच्चा कर्मयोगी वही है, जो ‘मैं’ और ‘मेरा’ की भावना से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र की सेवा को अपना सर्वोच्च धर्म माने। उनका धैर्य और आत्मसंयम भी अनुकरणीय था। जब किसी ने व्यंग्य करते हुए पूछा कि क्या समिति में केवल वे महिलाएँ कार्य करती हैं जिनका परिवार नहीं है, तब उन्होंने मुस्कुराकर उत्तर दिया—”मैं स्वयं सात बच्चों की माँ हूँ।” उनके इस सहज उत्तर ने आलोचकों को भी निरुत्तर कर दिया।
उन्होंने महिलाओं को माता सीता के साहस, पवित्रता और कर्तव्यनिष्ठा का अनुसरण करने का संदेश दिया। लगभग 60 वर्ष की आयु में उन्होंने हिंदी सीखना प्रारंभ किया और निरंतर अभ्यास से उस पर अच्छी पकड़ बना ली। संगठन के प्रारंभिक दिनों में उन्होंने तैरना, साइकिल चलाना और लाठी चलाना भी सीखा। वे गाँव-गाँव जाकर रामायण की कथा सुनातीं और लोगों को उसके आदर्शों को जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित करती थीं।
निष्कर्ष :
वंदनीय लक्ष्मीबाई केलकर (मौसीजी) का संपूर्ण जीवन सेवा, समर्पण, अनुशासन, स्वाध्याय, राष्ट्रभक्ति और नारी सशक्तिकरण का सजीव उदाहरण है। उनका व्यक्तित्व आज भी प्रत्येक व्यक्ति, विशेषकर महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनके आदर्श हमें बताते हैं कि निस्वार्थ सेवा, सतत अध्ययन, विनम्र नेतृत्व और राष्ट्र के प्रति समर्पण ही सच्चे जीवन की पहचान है। उनके विचार और कार्य आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरणा देते रहेंगे।



