
किसानों एवं ग्रामीणों को पशुजन्य रोगों से बचाव हेतु व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने पर दिया गया जोर
राज नेशनल न्यूज़ खैरागढ़ : कलेक्टर इंद्रजीत सिंह चंद्रवाल के निर्देशन एवं मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत प्रेम कुमार पटेल के मार्गदर्शन में विश्व जूनोसिस (पशुजन्य रोग) दिवस के अवसर पर किसानों, पशुपालकों एवं ग्रामीणों को पशुजन्य रोगों के प्रति जागरूक करने तथा प्रभावी स्वास्थ्य शिक्षा गतिविधियों के संचालन के उद्देश्य से स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की कार्यशाला आयोजित की गई।
कार्यशाला को संबोधित करते हुए मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, जिला खैरागढ़-छुईखदान-गंडई, डॉ. आशीष शर्मा ने कहा कि पशुजन्य रोगों की रोकथाम के लिए “वन हेल्थ (One Health)” की अवधारणा को अपनाना आवश्यक है। मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य एवं पर्यावरण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिए स्वास्थ्य विभाग, पशुधन विकास विभाग, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग तथा समुदाय के समन्वित प्रयासों से ही इन रोगों की प्रभावी रोकथाम संभव है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देशित किया कि वे अपने-अपने कार्यक्षेत्र में किसानों, पशुपालकों एवं ग्रामीणों के बीच नियमित स्वास्थ्य शिक्षा एवं जनजागरूकता गतिविधियाँ संचालित करें तथा संदिग्ध रोगियों की शीघ्र पहचान कर समय पर उपचार सुनिश्चित करें।
कार्यशाला में बताया गया कि जूनोसिस (Zoonosis) ऐसे संक्रामक रोग हैं जो संक्रमित पशुओं, पक्षियों अथवा उनके उत्पादों के सीधे संपर्क, दूषित भोजन या पानी तथा किलनी, पिस्सू, मच्छर जैसे वाहकों के माध्यम से मनुष्यों में फैल सकते हैं।
प्रशिक्षण के दौरान प्रमुख पशुजन्य रोगों के कारण, लक्षण एवं बचाव की जानकारी दी गई। बताया गया कि रेबीज संक्रमित कुत्ते, बिल्ली अथवा अन्य स्तनधारी पशु के काटने या खरोंचने से फैलता है। किसी पशु के काटने पर घाव को तुरंत साबुन एवं बहते पानी से कम से कम 15 मिनट तक धोकर निकटतम स्वास्थ्य संस्थान में जाकर एंटी-रेबीज वैक्सीन तथा आवश्यकता होने पर रैबीज इम्युनोग्लोबुलिन लगवाना चाहिए।
ब्रुसेलोसिस संक्रमित पशुओं के कच्चे (बिना उबले) दूध एवं दूध से बने उत्पादों के सेवन अथवा संक्रमित पशुओं के संपर्क से फैल सकता है। इसके प्रमुख लक्षण लंबे समय तक रहने वाला बुखार, अत्यधिक पसीना, कमजोरी तथा जोड़ों में दर्द हैं। बचाव के लिए केवल उबला या पाश्चुरीकृत दूध एवं दुग्ध उत्पादों का सेवन करें तथा पशुओं की प्रसूति के समय दस्ताने एवं अन्य सुरक्षात्मक साधनों का उपयोग करें।
स्क्रब टायफस संक्रमित चिगर माइट (किलनी के लार्वा) के काटने से होता है। इसके लक्षणों में तेज बुखार, सिरदर्द, शरीर में दर्द तथा त्वचा पर काले रंग का घाव (Eschar) प्रमुख हैं। बचाव के लिए झाड़ियों एवं घास वाले क्षेत्रों में कार्य करते समय पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें, शरीर की नियमित जांच करें तथा बुखार होने पर तुरंत स्वास्थ्य संस्थान में संपर्क करें।
लेप्टोस्पायरोसिस संक्रमित पशुओं के मूत्र से दूषित पानी या मिट्टी के संपर्क में आने से फैलता है। इसके लक्षणों में तेज बुखार, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द तथा गंभीर स्थिति में पीलिया एवं गुर्दे की समस्या हो सकती है। बचाव के लिए गंदे या बाढ़ के पानी में नंगे पैर न जाएँ तथा सुरक्षात्मक जूते एवं दस्तानों का उपयोग करें।
कार्यशाला में अधिकारियों को यह भी बताया गया कि पशुजन्य रोगों की रोकथाम के लिए पशुओं का नियमित टीकाकरण, स्वच्छ एवं सुरक्षित पशुपालन, व्यक्तिगत स्वच्छता, स्वच्छ पेयजल का उपयोग, कच्चे दूध एवं अधपके मांस के सेवन से बचाव तथा बीमार पशुओं के संपर्क में आने पर आवश्यक सावधानियाँ अपनाना अत्यंत आवश्यक है। किसी भी पशुजन्य रोग के लक्षण दिखाई देने पर स्वयं उपचार या झाड़-फूंक जैसी भ्रांतियों का सहारा लेने के बजाय तत्काल निकटतम स्वास्थ्य संस्थान में चिकित्सकीय परामर्श एवं उपचार प्राप्त करना चाहिए।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आशीष शर्मा ने अधिकारियों से अपील की कि वे ग्राम पंचायतों, विद्यालयों, आंगनबाड़ी केन्द्रों, किसान समूहों, स्व-सहायता समूहों एवं अन्य सामुदायिक मंचों के माध्यम से व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाकर अधिक से अधिक लोगों तक यह संदेश पहुँचाएँ कि “सतर्कता, स्वच्छता, सुरक्षित पशुपालन और समय पर उपचार ही पशुजन्य रोगों से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है।”
कार्यशाला में उपस्थित अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने अपने-अपने कार्यक्षेत्र में व्यापक जनजागरूकता गतिविधियाँ संचालित कर पशुजन्य रोगों की रोकथाम एवं नियंत्रण में सक्रिय भूमिका निभाने का संकल्प लिया।



